shreedhar ki bakwaas
Thursday, March 20, 2014
Thursday, July 8, 2010
इलेक्ट्रानिक मीडिया को महंगाई की नही, धोनी की घोडी और विवेका बाबाजी की फिक्र!
इलेक्ट्रानिक मीडिया को महंगाई की नही, धोनी की घोडी और विवेका बाबाजी की फिक्र!
इलेक्ट्रानिक मीडिया की खबरों को लेकर शरद यादव ने जो नाराजगी व्यक्त की है.वह नाराजगी कुछ हद तक इसलिए सही है कि इस समय महंगाई जैसे समस्या को लेकर गरीब वर्ग की कमर टूटी हुई है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक वर्ग को फाइव स्टार संस्कृति में आदी रहने के कारण केवल धोनी की शादी के लिए तैयार घोडी. उनकी शेरवानी. देश की सम्पत्ति माडल विवेका बाबा की आत्महत्या से हुए नुकसान और राखी सांवत की हर ओछी हरकत ही खबर नजर आती है
पिछले एक दो वर्षो से कुछ चैनल तो सरकारी प्रवक्ता बनते जा रहे है उन्हे किसी समस्या को उठाने में राजनीति दिखाई पडती है इसी कारण चाहे वह एनडीए सरकार के खिलाफ कोई आन्दोलन रहा हो अथवा यूपीए सरकार के खिलाफ. हर नफे नुकसान का आकलन स्टूडियों में बैठकर कर लेते है कल के भारत बंद के दौरान चैनलों की ओर से इस बात का ज्ञान दिया गया कि महंगाई के खिलाफ इस तरह से सडकों पर उतरकर आन्दोलन नही करना चाहिए अब सवाल उठता है कि महंगाई की तरफ सरकार का ध्यान दिलाने का और कौन सा तरीका हो सकता है क्या चैनल्स के स्टूडियों में बैठकर केवल आंकडे बाजी करने से समस्या का अंत हो सकता है
पत्रकारिता के बारे में कहा जाता था कि वह सत्ता और जनता के बीच समन्वय का काम करती है उसका काम जनता की कमियों को सरकार तक तथा सरकार की कमियों को जनता तक पहुचाने का होता है लेकिन बदली परिभाषा ने इलेक्ट्रानिक मीडिया को अब सरकार में कोई कमी नही दिखाई देती है वह तो केवल सरकारी भोपूं बनते जा रहे है यही नही अब उसका प्रयास तो विपक्ष के आन्दोलन की हवा निकालने का रहता है.
इसके पीछे सच्चाई यह है कि प्रिन्ट मीडिया के विपरीत इलेक्ट्रानिकमीडिया के मालिकों/सम्पादकों को पता नही होता कि एक गरीब कैसे एक समय भोजन कर काम चला रहा है मुझसे कुछ समय पहले बात बात में ईट गारा का काम करने वाले एक मजदूर ने कहा था कि ‘‘साहब हमने एक साल से दाल नही खाई है’’
Friday, June 25, 2010
लखनऊ के डग्गेबाज पत्रकार!
पत्रकारिता के गिरते स्तर की खबरे आये दिन मिलती रहती है.चाहे वह दिल्ली हो या मुम्बई अथवा कोई और जगह.लेकिन हाल ही में नजाकत और नफासत के शहर लखनऊ में पत्रकारिता का घिनौना रूप उस समय देखने को मिला जब यहां के एक पंचसितारा होटल में एक मल्टीनेशनल कम्पनी की तरफ से अपने नये उत्पाद के सम्बन्ध में आयोजित की गयी कांफ्रेंस के दौरान डग्गे (गिफ्ट ) को लेकर पत्रकारों में धक्का मुक्की शुरू हो गयी.बगैर इन्वीटेशन के पहुंचे तथाकथित पत्रकार तो गिफ्ट लेकर रफूचक्कर हो गये लेकिन जो वास्तविक पत्रकार थें वह धक्कामुक्की में असफल होने के बाद हताश दिख रहे थें गिफृट पाने की इस कदर होड मची थी कि जो युवतियां वहां गिफ्ट बांटने के लिए बैठाली गयी थी उनके चेहरे की हवाइयां उडी हुई थी कई बार इस धक्कामुक्की में वह अपने को सुरक्षित करने के लिए जैसे ही पीछे हटती तब तक उनके हाथ से गिफ्ट गायब हो चुका होता था.एक बार तो ऐसा मौका आया कि एक गिफ्ट पर एक कैमरामैन और एक स्वयभू पत्रकार का हाथ एक साथ पड गया जिसे लेकर दोनो में मारपीट की नौबत आ गयी लेकिन जीत स्वयंभू पत्रकार की हुई.यह स्वयभूं पत्रकार एक धार्मिक शिक्षण संस्था से अधिक गिफ्ट पाने के लिए तीन चार छात्रों को लेकर पंचसितारा होटल पहुंचे थें
इसी तरह लखनऊ में एक जाने माने शिक्षण संस्थान के प्रबन्धकों की तरफ से महीने में दो तीन बार प्रेस कांफेन्स का आयोजन किया जाता है. जिसमें स्कूल की उपलब्धियों का गुणगान काफी देर तक किया जाता है प्रेस कांफ्रेन्स के बाद खाने पीने का इंतजाम तो रहता ही साथ में गिफ्ट भी रहता है. इसे लेकर भी एक अलग तरह का नजारा हर प्रेस कांफेन्स में देखने को मिलता है एक बार तो हद तब हो गयी जब प्रबन्धक महोदय स्कूल की उपलब्धियां गिना रहे थें और सारे पत्रकार मन में डग्गे की कल्पना लिए खाने की ओर बढ रहे थें स्कूल प्रबन्धक की तरफ से कई बार आग्रह करने के बाद भी जब पत्रकार नही रूके तो उन्हे कहना पडा रोक दीजिये...................खाना रोक दीजिये
इसी तरह लखनऊ में एक जाने माने शिक्षण संस्थान के प्रबन्धकों की तरफ से महीने में दो तीन बार प्रेस कांफेन्स का आयोजन किया जाता है. जिसमें स्कूल की उपलब्धियों का गुणगान काफी देर तक किया जाता है प्रेस कांफ्रेन्स के बाद खाने पीने का इंतजाम तो रहता ही साथ में गिफ्ट भी रहता है. इसे लेकर भी एक अलग तरह का नजारा हर प्रेस कांफेन्स में देखने को मिलता है एक बार तो हद तब हो गयी जब प्रबन्धक महोदय स्कूल की उपलब्धियां गिना रहे थें और सारे पत्रकार मन में डग्गे की कल्पना लिए खाने की ओर बढ रहे थें स्कूल प्रबन्धक की तरफ से कई बार आग्रह करने के बाद भी जब पत्रकार नही रूके तो उन्हे कहना पडा रोक दीजिये...................खाना रोक दीजिये
Tuesday, June 15, 2010
प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए मुफीद है मुंह लपेटू संस्कृति
इन दिनों भीषण गर्मी के चलते हर कोई परेशान है लेकिन युवा वर्ग गर्मी को लेकर इसलिए परेशान नही है क्योंकि चेहरे पर नकाब षैली में दुपट्टा लपेट कर और प्रेमी की कमर में हाथ डालकर बाइक में धूमने का मजा तो इन्ही दिनों है शहरों में नये नये दो पहिया वाहनों में यह जोडे अपने कुल देवता इमरान हाशमी और मल्लिका शेरावत का स्मरण करते हुए इस नये तरीके से बेहद आनन्दित है गर्मी के बहाने चेहरे पर नकाब स्टाइल दुपटटा लपेटने का फैशन इन दिनों खूब फलफूल रहा है गर्मी की आड में चेहरे को कपडे से ढककर सैर सपाटे करने का प्रचलन इन दिनों खूब जोरों पर है एक समाज सुधारवादी संगठन के नेता ने मुझसे कहा कि ‘‘आप लोग मीडिया वाले इस पर कुछ लिखते क्यों नही’’ इस पर हमने कहा कि ‘‘आप लोग पहल कीजिए. हम उसका कवरेज कर शासन प्रशासन तक आपकी बात पहुंचायेगें जिस पर उन सज्जन ने कहा कि इसका विरोध करने पर देश की धर्मनिरपेक्ष छवि पर भारी असर पड सकता है इसलिए हिम्मत नही पड रही है हांलकि उन्होने अपनी बात को बल देते हुए एक बार फिर कहा कि मध्यप्रदेश पुलिस ने तो दोपहिया वाहन सवारों पर चेहरा ढककर घूमने में प्रतिबन्ध लगाया हुआ है तो यहां उत्तर प्रदेश में इसपर प्रतिबन्ध क्यों नही लग सकता है
वैसे युवा प्रेमी प्रेमिकाओं में सिर छुपाओं संस्कृति का क्रेज दिन पर दिन बढता ही जा रहा है अब तो ‘‘जाडा गर्मी हो बरसात दुपट्टा रखों अपने साथ’’ का सिद्वान्त देश में खूब फल फूल रहा है यही नही, बाइक सवार यह युवा प्रेमी जोडे उस समय तो और अधिक आनन्दित होते है जब बगल से उनके माता पिता उनको बगैर पहचाने यह कहते निकल जाते है कि जमाना बहुत खराब हो गया है मा बाप अपने बच्चों पर निगाह भी नही रखते है..........
Saturday, October 10, 2009
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