Thursday, July 8, 2010

इलेक्ट्रानिक मीडिया को महंगाई की नही, धोनी की घोडी और विवेका बाबाजी की फिक्र!

इलेक्ट्रानिक  मीडिया को महंगाई की नही, धोनी की घोडी और विवेका बाबाजी की फिक्र!

इलेक्ट्रानिक मीडिया की खबरों को लेकर शरद यादव ने जो नाराजगी व्यक्त की है.वह नाराजगी कुछ हद तक इसलिए सही है कि इस समय महंगाई जैसे समस्या को लेकर गरीब वर्ग की कमर टूटी हुई है लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया के एक वर्ग को फाइव स्टार संस्कृति में आदी रहने के कारण केवल धोनी की शादी के लिए तैयार घोडी. उनकी शेरवानी. देश की सम्पत्ति माडल विवेका बाबा की आत्महत्या से हुए नुकसान और राखी सांवत की हर ओछी हरकत ही खबर नजर आती है

पिछले एक दो वर्षो से कुछ चैनल तो सरकारी प्रवक्ता बनते जा रहे है उन्हे किसी  समस्या को उठाने में राजनीति दिखाई पडती है इसी कारण चाहे वह एनडीए सरकार के खिलाफ कोई आन्दोलन रहा हो अथवा यूपीए सरकार के खिलाफ. हर नफे नुकसान का आकलन स्टूडियों में बैठकर कर लेते है कल के भारत बंद के दौरान चैनलों की ओर से इस बात का ज्ञान दिया गया कि महंगाई के खिलाफ इस तरह से सडकों पर उतरकर आन्दोलन नही करना चाहिए अब सवाल उठता है कि महंगाई की तरफ सरकार का ध्यान दिलाने का और कौन सा तरीका हो सकता है क्या चैनल्स के स्टूडियों में बैठकर केवल आंकडे बाजी करने से समस्या का अंत हो सकता है 

पत्रकारिता के बारे में कहा जाता था कि वह सत्ता और जनता के बीच समन्वय का काम करती है उसका काम जनता की कमियों को सरकार तक तथा सरकार की कमियों को जनता तक पहुचाने का होता है लेकिन बदली परिभाषा ने इलेक्ट्रानिक मीडिया को अब सरकार में कोई कमी नही दिखाई देती है वह तो केवल सरकारी भोपूं बनते जा रहे है  यही नही अब उसका प्रयास तो विपक्ष के आन्दोलन की हवा निकालने का रहता है.

इसके पीछे सच्चाई यह है कि प्रिन्ट मीडिया के विपरीत इलेक्ट्रानिकमीडिया के मालिकों/सम्पादकों को पता नही होता कि एक गरीब कैसे एक समय भोजन कर काम चला रहा है मुझसे कुछ समय पहले बात बात में ईट गारा का काम करने वाले एक मजदूर ने कहा था कि ‘‘साहब हमने एक साल से दाल नही खाई है’’

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